सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: सिविल विवाद होने मात्र से धोखाधड़ी और जालसाजी का आपराधिक केस खत्म नहीं किया जा सकता

जालसाजी और धोखाधड़ी जैसे मामलों में हमेशा एक 'सिविल' तत्व होता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पुलिस जांच को रोक दिया जाए...

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: सिविल विवाद होने मात्र से धोखाधड़ी और जालसाजी का आपराधिक केस खत्म नहीं किया जा सकता

ब्यूरो रिपोर्ट - News Flash INDIA-   सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी मामले में प्रथम दृष्टया आपराधिक अपराध बनता है, तो केवल इसलिए कि वह विवाद दीवानी (Civil) प्रकृति का है, उसे रद्द नहीं किया जा सकता।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को पलट दिया है जिसमें पारिवारिक संपत्ति के विवाद में दर्ज FIR को 'सिविल' मानकर रद्द कर दिया गया था। 

  • ये है मामले की पृष्ठभूमि....

​यह मामला चेन्नई स्थित करोड़ों की तीन अचल संपत्तियों के 'सेटलमेंट डीड' (Settlement Deeds) से जुड़ा है। अपीलकर्ता डॉ. सी.एस. प्रसाद ने आरोप लगाया कि उनके बड़े भाई डॉ. सी. सत्यकुमार (प्रतिवादी संख्या 1) ने उनके माता-पिता की वृद्धावस्था और शारीरिक लाचारी का अनुचित लाभ उठाकर धोखाधड़ी से ये दस्तावेज अपने पक्ष में बनवा लिए। इन संपत्तियों के मूल मालिक स्वर्गीय डॉ. सी. सत्यनारायण और उनकी पत्नी स्वर्गीय श्रीमती सी. लक्ष्मी देवी थे। 

  • हाईकोर्ट का रुख और सुप्रीम कोर्ट की आपत्ति 

​मद्रास हाईकोर्ट ने आरोपी व्यक्तियों के खिलाफ कार्यवाही को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि एक दीवानी अदालत पहले ही इन सेटलमेंट डीड को वैध ठहरा चुकी है और शिकायतकर्ता ने आपराधिक केस दर्ज करने में 6 साल की देरी की है।  


​सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस तर्क को खारिज करते हुए निम्नलिखित महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ की :

  • ​दोहरी जवाबदेही: अदालत ने कहा कि एक ही घटना से दीवानी और आपराधिक दोनों तरह की कानूनी कार्यवाही शुरू हो सकती है। दीवानी कार्यवाही लंबित होने या समाप्त होने मात्र से आपराधिक केस खत्म नहीं हो जाता। 
    • ​मजिस्ट्रेट की भूमिका: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट को धारा 482 के तहत यह नहीं देखना चाहिए कि आरोप कितने विश्वसनीय हैं, बल्कि यह देखना चाहिए कि क्या आरोपों में कोई अपराध बनता है।
  • ​देरी पर स्पष्टीकरण: शीर्ष अदालत ने माना कि शिकायत दर्ज करने में देरी (Delay in FIR) अपने आप में केस रद्द करने का आधार नहीं हो सकती। देरी के प्रभाव की जांच ट्रायल कोर्ट में साक्ष्यों के आधार पर होनी चाहिए।  
    • ​धोखाधड़ी की प्रकृति: जालसाजी और धोखाधड़ी जैसे मामलों में हमेशा एक 'सिविल' तत्व होता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पुलिस जांच को रोक दिया जाए।
  • सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुख्य बिंदु 

समानांतर कार्यवाही (Parallel Proceedings): कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि एक ही घटना से दीवानी (Civil) और आपराधिक (Criminal) दोनों तरह की देनदारियां बन सकती हैं। दीवानी केस का निपटारा होना आपराधिक केस को खत्म करने का आधार नहीं है, यदि अपराध के तत्व मौजूद हों।  

हाईकोर्ट की सीमाएं (Scope of Section 482): धारा 482 के तहत हाईकोर्ट को केवल यह देखना चाहिए कि क्या प्रथम दृष्टया (on the face of it) कोई अपराध दिखता है। उसे सबूतों की गहराई में जाकर यह तय नहीं करना चाहिए कि आरोप सच हैं या झूठ।  

देरी का महत्व: शिकायत दर्ज करने में हुई देरी को ट्रायल (Trial) के दौरान परखा जाना चाहिए। इसे केवल शुरुआती स्तर पर केस रद्द करने का हथियार नहीं बनाया जा सकता।

निष्कर्ष और आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ता ने स्पष्ट आरोप लगाए हैं कि प्रतिवादियों ने मानसिक रूप से कमजोर बुजुर्गों से धोखाधड़ी कर दस्तावेज बनवाए और उनका गलत इस्तेमाल किया। इन आरोपों के लिए पूर्ण ट्रायल (Trial) की आवश्यकता है।  

अदालत ने मद्रास हाईकोर्ट के 22 अक्टूबर 2024 के फैसले को रद्द करते हुए चेन्नई स्थित विशेष न्यायालय को निर्देश दिया है कि वह इस मामले में आपराधिक ट्रायल को फिर से शुरू करे। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि ट्रायल कोर्ट को इस मामले में स्वतंत्र रूप से निर्णय लेना चाहिए।

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