इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: नियमों के विरुद्ध पुलिसकर्मी का तबादला और रिलीविंग ऑर्डर रद्द
कोर्ट ने पाया कि जब सरकारी सर्कुलर स्पष्ट रूप से कहता है कि 7 दिनों के भीतर कार्यमुक्ति होनी चाहिए, तो याचिकाकर्ता को इतने महीनों बाद कार्यमुक्त नहीं किया जा सकता.........
ब्यूरो रिपोर्ट - News Flash INDIA- इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश पुलिस विभाग में तबादलों और कार्यमुक्ति (Relieving) को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि विभाग अपने ही तय समय-सीमा के भीतर कर्मचारी को कार्यमुक्त नहीं करता है, तो वह तबादला आदेश कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं है। न्यायमूर्ति विकास बुधवार की एकल पीठ ने हेड कांस्टेबल दुर्गा प्रसाद द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए उनके तबादले और कार्यमुक्ति आदेश को रद्द कर दिया है।
- क्या था पूरा मामला?
याचिकाकर्ता दुर्गा प्रसाद, जो सिविल पुलिस में हेड कांस्टेबल के पद पर तैनात थे, का तबादला 26 मई 2025 को सिविल पुलिस से जी.आर.पी. (GRP) लखनऊ के लिए किया गया था। हालांकि, उन्हें इस आदेश के लगभग ढाई महीने बाद 11 अगस्त 2025 को कार्यमुक्त करने का आदेश जारी किया गया।
याचिकाकर्ता ने इस देरी को उत्तर प्रदेश सरकार के शासनादेशों और सर्कुलर का उल्लंघन बताते हुए हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
- कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि 06 मई 2025 के सरकारी आदेश के अनुसार, किसी भी कर्मचारी का तबादला होने पर उसे एक सप्ताह (7 दिन) के भीतर कार्यमुक्त करना अनिवार्य है। इस मामले में विभाग ने महीनों की देरी की, जिसके लिए कोई ठोस या असाधारण कारण नहीं बताया गया। कोर्ट ने कहा कि विभाग अपने ही नियमों और सर्कुलर से बंधा हुआ है और वह अपनी मनमर्जी से इसमें देरी नहीं कर सकता।
- वादी के अधिवक्ता: श्री रूपेश कुमार सिंह की अहम भूमिका
इस मामले में याचिकाकर्ता (वादी) की ओर से विद्वान अधिवक्ता श्री रूपेश कुमार सिंह ने प्रभावी पैरवी की।
सटीक दलीलें: श्री रूपेश कुमार सिंह ने कोर्ट के समक्ष यह मजबूती से रखा कि विभाग का कार्यमुक्ति आदेश न केवल देरी से आया, बल्कि यह स्थापित कानूनी सिद्धांतों के भी विपरीत था।
कानूनी संदर्भ: उन्होंने कोर्ट का ध्यान 17 अक्टूबर 2025 के सर्कुलर और पूर्व में दिए गए 'स्पेशल अपील संख्या 481/2024' के फैसले की ओर आकर्षित किया, जिससे केस का रुख याचिकाकर्ता के पक्ष में मुड़ गया। उनकी दलीलों के आगे सरकारी वकील (C.S.C.) ने भी स्वीकार किया कि सरकारी नियम बाध्यकारी हैं और विभाग से यहाँ चूक हुई है।
- फैसले का प्रभाव
अदालत ने पुलिस महानिदेशक (DGP) और पुलिस अधीक्षक, कासगंज द्वारा पारित क्रमशः तबादला और कार्यमुक्ति आदेशों को निरस्त (Quash) कर दिया है। इस फैसले से उन हजारों पुलिसकर्मियों को राहत मिलने की उम्मीद है जो तबादला आदेश होने के बावजूद लंबे समय तक रिलीविंग का इंतजार करते हैं या नियमों के विरुद्ध देरी से रिलीव किए जाते हैं।
हालाँकि, कोर्ट ने विभाग को यह स्वतंत्रता दी है कि यदि प्रशासनिक आवश्यकता हो, तो वे भविष्य में नियमों के तहत नया आदेश पारित कर सकते हैं।
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