"सजा देना अदालत का काम है, पुलिस का नहीं"- इलाहाबाद हाईकोर्ट । हाफ एनकाउंटर पर लगाई लगाम
इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: "सजा देना अदालत का काम है, पुलिस का नहीं" पुलिस मुठभेड़ के लिए नई 'चेकलिस्ट' (SOP) जारी
ब्यूरो रिपोर्ट - News Flash INDIA- प्रयागराज: उत्तर प्रदेश में आरोपियों के पैरों में गोली मारने की बढ़ती घटनाओं, जिन्हें बोलचाल की भाषा में 'हाफ एनकाउंटर' कहा जाता है, पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है।
न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा है कि अपराधियों को सजा देना न्यायपालिका का अधिकार क्षेत्र है और पुलिस को स्वयं 'जज' बनकर सजा देने का कोई अधिकार नहीं है।
- अदालत ने यह भी चेतावनी दी कि यदि भविष्य में एनकाउंटर के नियमों का उल्लंघन पाया गया, तो संबंधित जिले के पुलिस कप्तान (SP/SSP/कमिश्नर) सीधे तौर पर 'अदालत की अवमानना' (Contempt of Court) के दोषी माने जाएंगे।

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- मुख्य बिंदु:
1. प्रसिद्धि और प्रमोशन के लिए फायरिंग गलत
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति देशवाल ने पाया कि कई पुलिस अधिकारी केवल सोशल मीडिया पर प्रसिद्धि पाने, ऊंचे अधिकारियों को खुश करने या 'आउट ऑफ टर्न प्रमोशन' (समय से पहले पदोन्नति) पाने के लिए आरोपियों के पैरों में गोली मार देते हैं। कोर्ट ने कहा, "भारत एक लोकतांत्रिक देश है जो संविधान से चलता है। पुलिस कानून हाथ में लेकर न्यायपालिका की भूमिका नहीं निभा सकती।"
2. डीजीपी और गृह सचिव की पेशी
मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के डीजीपी राजीव कृष्ण और अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) संजय प्रसाद को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए तलब किया था। कोर्ट ने उनसे पूछा कि क्या राज्य में पुलिस को पैरों में गोली मारने के कोई मौखिक या लिखित निर्देश दिए गए हैं? अधिकारियों ने आश्वासन दिया कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे।
3. पुलिस मुठभेड़ के लिए नई 'चेकलिस्ट' (SOP) जारी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस मुठभेड़ (एनकाउंटर) में गंभीर चोट लगने के मामलों के लिए निम्नलिखित 6-सूत्रीय सख्त दिशा-निर्देश (गाइडलाइन्स) निर्धारित किए हैं अदालत ने एनकाउंटर के मामलों में 6-सूत्रीय सख्त दिशा-निर्देश का पालन अनिवार्य किया है :
- FIR का पंजीकरण और स्वतंत्र जांच: मुठभेड़ में गोलीबारी के कारण आरोपी या किसी अन्य व्यक्ति को गंभीर चोट लगने पर, पुलिस पार्टी के प्रमुख द्वारा संबंधित या नजदीकी थाने में तुरंत FIR दर्ज कराई जाएगी। इस मामले की जांच CBCID या किसी अन्य थाने की पुलिस टीम द्वारा की जाएगी, जिसका नेतृत्व एनकाउंटर करने वाली टीम के प्रमुख से कम से कम एक स्तर वरिष्ठ (Senior) अधिकारी करेगा।
- आरोपी के नाम का उल्लेख: एनकाउंटर के संबंध में दर्ज FIR में पुलिस पार्टी के सदस्यों के नाम 'अभियुक्त' या 'संदिग्ध' की श्रेणी में लिखना अनिवार्य नहीं है; इसमें केवल टीम (जैसे STF या नियमित पुलिस) का उल्लेख किया जा सकता है।
- चिकित्सा सहायता और मजिस्ट्रेट के सामने बयान: घायल व्यक्ति को तत्काल चिकित्सा सहायता प्रदान की जाएगी और उसकी चोटों का परीक्षण किया जाएगा। इसके बाद, घायल व्यक्ति का बयान मजिस्ट्रेट या मेडिकल ऑफिसर द्वारा दर्ज किया जाना अनिवार्य है, जिसके साथ घायल की स्थिति का 'फिटनेस सर्टिफिकेट' (Fitness Certificate) भी संलग्न होगा।
- जांच रिपोर्ट और अदालती प्रक्रिया: पुलिस मुठभेड़ की घटना की पूरी जांच के बाद, रिपोर्ट सक्षम न्यायालय को भेजी जाएगी। न्यायालय इसके बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा PUCL बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करेगा।
- पुरस्कार और पदोन्नति पर रोक: मुठभेड़ के तुरंत बाद संबंधित पुलिस अधिकारियों को 'आउट-ऑफ-टर्न' पदोन्नति (Promotion) या वीरता पुरस्कार नहीं दिया जाएगा। ऐसे पुरस्कार केवल तभी दिए या अनुशंसित किए जाएंगे जब पुलिस प्रमुख द्वारा गठित समिति द्वारा अधिकारियों की वीरता संदेह से परे साबित हो जाए।
- शिकायत और अवमानना की कार्यवाही: यदि पीड़ित परिवार को लगता है कि उपरोक्त प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है या जांच निष्पक्ष नहीं है, तो वे क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार वाले सत्र न्यायाधीश (Sessions Judge) से शिकायत कर सकते हैं। सत्र न्यायाधीश शिकायत के गुणों के आधार पर उचित कार्रवाई करेंगे और गंभीर उल्लंघन के मामलों में अवमानना कार्यवाही के लिए मामला हाईकोर्ट को भेज सकते हैं।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि इन नियमों का उल्लंघन होने पर न केवल मुठभेड़ टीम का प्रमुख, बल्कि जिले के पुलिस प्रमुख (SP/SSP/कमिश्नर) भी सीधे तौर पर 'अदालत की अवमानना' (Contempt of Court) के लिए जिम्मेदार होंगे।
4. जजों पर दबाव बनाने की कोशिश पर नाराजगी
कोर्ट ने एक और चौंकाने वाला खुलासा करते हुए कहा कि कुछ पुलिस अधिकारी जिला स्तर के जजों (विशेषकर CJM) पर अपनी मर्जी के आदेश पारित करने के लिए दबाव बनाते हैं। कोर्ट ने दो-टूक कहा कि एक पुलिस अधिकारी को कभी यह नहीं सोचना चाहिए कि वह न्यायिक अधिकारी से श्रेष्ठ है।
पूरा मामला क्या था?
यह पूरा आदेश मिर्जापुर के राजू उर्फ राजकुमार की जमानत अर्जी पर सुनवाई के दौरान आया। राजू पर चोरी का आरोप था और पुलिस ने मुठभेड़ के दौरान उसके पैर में गोली मार दी थी। कोर्ट ने पाया कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के 'PUCL बनाम महाराष्ट्र' केस के दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया गया था। कोर्ट ने राजू को जमानत पर रिहा करने का आदेश देते हुए पूरे प्रदेश की पुलिस व्यवस्था के लिए यह कड़ा संदेश जारी किया।
निष्कर्ष:
हाईकोर्ट के इस फैसले से उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली में बड़े बदलाव की उम्मीद है। अब जिले के पुलिस प्रमुखों की यह जिम्मेदारी होगी कि वे सुनिश्चित करें कि उनके अधीनस्थ अधिकारी कानून की सीमाओं के भीतर रहकर ही अपराधियों पर कार्रवाई करें।
See The Court Order