नोएडा DM मेधा रूपम को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत, इलाहाबाद हाईकोर्ट के 5 लाख हर्जाने और सख्त टिप्पणियों के आदेश पर लगाई रोक, जानिए कोर्ट में किन तथ्यों पर हुई पूरे मामले में सुनवाई

IAS मेधा रूपम को SC से राहत , छात्रा आकृति चौधरी की NSA हिरासत रद्द करने के साथ डीएम के वेतन से 5 लाख का हर्जाना वसूलने और सख्त टिप्पणियां करने के निर्देश दिए गए थे। पढ़िए पूरी खबर।

नोएडा DM मेधा रूपम को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत, इलाहाबाद हाईकोर्ट के 5 लाख हर्जाने और सख्त टिप्पणियों के आदेश पर लगाई रोक, जानिए कोर्ट में किन तथ्यों पर हुई पूरे मामले में सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट से नोएडा DM मेधा रूपम को बड़ी राहत: हाईकोर्ट के हर्जाने और सख्त टिप्पणियों के आदेश पर लगाई रोक

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विशेष रिपोर्ट | नई दिल्ली / नोएडा

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​नोएडा (गौतम बुद्ध नगर) की जिलाधिकारी (DM) मेधा रूपम और उत्तर प्रदेश सरकार को सुप्रीम कोर्ट से एक बड़ी अंतरिम राहत मिली है। इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आकृति चौधरी पर लगाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) को रद्द करते हुए DM के वेतन से 5 लाख रुपये का हर्जाना वसूलने और कठोर टिप्पणियां (Strictures) पारित करने के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक (Stay) लगा दी है।

​जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस नोंगमेईकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने 23 सितंबर 2026 को इस मामले में सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट के फैसले के विवादित अंशों (पैरा 27 से 33) के क्रियान्वयन पर अगली सुनवाई तक स्टे दे दिया है।

1. सुप्रीम कोर्ट के आदेश का मुख्य बिंदु और विश्लेषण

​अपलोड किए गए सुप्रीम कोर्ट के आधिकारिक रिकॉर्ड (SLP (Crl) Diary No. 56202/2026 एवं SLP (Crl) No. 18010/2026) के अनुसार आदेश के प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं:

  1. विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर करने की अनुमति: सुप्रीम कोर्ट ने DM मेधा रूपम द्वारा हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर विशेष अनुमति याचिका स्वीकार कर ली और नोटिस जारी किया।

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  1. प्रतिवादियों को नोटिस और समय: छात्रा आकृति चौधरी (Respondent No. 1) की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्विस ने कैविएट पर नोटिस स्वीकार किया। कोर्ट ने उन्हें अपना लिखित जवाब (Counter-Affidavit) दाखिल करने के लिए 2 हफ्ते का समय दिया है।

  1. हाईकोर्ट के आदेश पर आंशिक स्टे (Interim Relief):
    • ​पीठ ने स्पष्ट आदेश दिया कि जब तक इस मामले की मुख्य सुनवाई (On Merits) पूरी नहीं हो जाती, तब तक इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के पैरा 27 से 33 की कार्रवाई पूरी तरह स्थगित (Stayed) रहेगी
    • ​इसमें जिलाधिकारी और अन्य अधिकारियों के वेतन से हर्जाना/कॉस्ट वसूलने और उनके खिलाफ हाईकोर्ट द्वारा की गई प्रतिकूल/सख्त टिप्पणियां शामिल हैं।

  1. अगली सुनवाई की तिथि: सुप्रीम कोर्ट ने मामले को 07 अक्टूबर 2026 को पुनः सूचीबद्ध (List) करने का निर्देश दिया है।

2. शीर्ष वकीलों की दलीलें

​सुनवाई के दौरान देश के शीर्ष कानूनविदों ने दोनों पक्षों की ओर से जोरदार पैरवी की:

  • डीएम मेधा रूपम की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता: उन्होंने दलील दी कि एक प्रशासनिक आदेश पारित करने की प्रक्रिया में पुलिस, अभियोजन और सलाहकार बोर्ड जैसे कई स्तर शामिल होते हैं। किसी अधिकारी को इस तरह व्यक्तिगत रूप से लक्षित कर उस पर व्यक्तिगत हर्जाना लगाना और कठोर टिप्पणियां करना प्रशासनिक व्यवस्था के अनुकूल नहीं है।

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  • उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी: उन्होंने याचिका संख्या 18010/2026 के तहत दलील दी कि हाईकोर्ट का आदेश पूरी तरह से अनुचित था। उन्होंने कहा कि NSA लगाने का प्रस्ताव स्थानीय थाना प्रभारी (SHO) द्वारा शुरू हुआ था, जिसे DM ने पारित किया और बाद में राज्य सलाहकार बोर्ड और केंद्र सरकार ने भी अनुमोदित किया था।

  • छात्रा आकृति चौधरी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्विस: उन्होंने हाईकोर्ट के उस फैसले का बचाव किया जिसमें प्रशासनिक शक्तियों के दुरुपयोग और मौलिक अधिकारों के हनन की बात कही गई थी।

3. पूरा मामला क्या था? (इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश)

​यह पूरा विवाद नोएडा (गौतम बुद्ध नगर) में अप्रैल 2026 में हुए श्रमिकों के प्रदर्शन और न्यूनतम मजदूरी की मांगों से जुड़ा है।

  • कार्रवाई: उत्तर प्रदेश पुलिस की सिफारिश पर मई 2026 में नोएडा DM मेधा रूपम ने 24 वर्षीया छात्रा और सामाजिक कार्यकर्ता आकृति चौधरी के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत निरुद्ध (Detain) करने का आदेश दिया था।

  • हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी: आकृति चौधरी द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeas Corpus Petition No. 960/2026) पर 2 सितंबर 2026 को फैसला सुनाते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की पीठ (जस्टिस अतुल श्रीधरन व जस्टिस अचल सचदेव) ने NSA की कार्रवाई को रद्द कर दिया।

  • ​हाईकोर्ट ने माना कि बिना किसी आपराधिक रिकॉर्ड वाली छात्रा पर बिना दिमाग लगाए (Without application of mind) कड़ा कानून थोपा गया, जो अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) का सीधा हनन है।

  • 5 लाख रुपये का जुर्माना: हाईकोर्ट ने छात्रा को 5 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया, जिसे सीधे DM मेधा रूपम और संबंधित पुलिस अधिकारियों (SHO तक) के वेतन से काटने का आदेश दिया था। हाईकोर्ट ने यह भी टिप्पणी की थी कि ऐसा निरंकुश रवैया राज्य को 'आर्वेलियन डिस्ट्रोपिया' (तानाशाही तंत्र) में बदल सकता है।

4. कानूनी व प्रशासनिक महत्व (Editorial Analysis)

  • प्रशासकों का मनोबल बनाम व्यक्तिगत जवाबदेही: इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला प्रशासनिक अधिकारियों में व्यक्तिगत जवाबदेही तय करने की दिशा में एक सख्त संदेश था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस पर रोक लगाने से प्रशासनिक अधिकारियों को अंतरिम राहत मिली है ताकि प्रक्रियागत त्रुटियों या निर्णयों के लिए उन पर व्यक्तिगत वित्तीय दंडात्मक कार्रवाई तुरंत लागू न हो।

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  • NSA का विवेकपूर्ण इस्तेमाल: यह मामला एक बार फिर यह रेखांकित करता है कि जब बात निवारक निरोध (Preventive Detention) और NSA जैसे गंभीर कानूनों की आती है, तो नागरिक स्वतंत्रता और राज्य की सुरक्षा शक्तियों के बीच संतुलन बनाए रखना कितना संवेदनशील है।

आगे क्या?

​सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद DM मेधा रूपम के वेतन से 5 लाख रुपये की कटौती और उनके सर्विस रिकॉर्ड पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों पर फिलहाल रोक लग गई है। अब सभी पक्षों की निगाहें 7 अक्टूबर 2026 को होने वाली अगली विस्तृत सुनवाई पर टिकी हैं, जहां सुप्रीम कोर्ट इस बात का अंतिम फैसला करेगा कि क्या किसी नौकरशाह को ऐसे मामलों में व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है या नहीं। 

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