सुप्रीम कोर्ट की यूपी पुलिस को कड़ी फटकार —'यूपी पुलिस के अधिकारियों को जांच प्रक्रिया सीखने की जरूरत', DGP और गृह सचिव को भेजा आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस की लचर कार्यशैली पर कड़ा रुख अपनाते हुए डीजीपी और गृह सचिव को निर्देश जारी किया है। एक झूठी कहानी के दम पर निर्दोष के 6 साल बर्बाद करने पर शीर्ष अदालत ने कहा कि पुलिस अधिकारियों को जांच प्रक्रिया सीखने की जरूरत है। पढ़ें पूरी खबर......

सुप्रीम कोर्ट की यूपी पुलिस को कड़ी फटकार —'यूपी पुलिस के अधिकारियों को जांच प्रक्रिया सीखने की जरूरत', DGP और गृह सचिव को भेजा आदेश

ब्यूरो रिपोर्ट : News Flash INDIA: नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यशैली और लचर जांच-पड़ताल पर बेहद कड़ा रुख अपनाया है। सर्वोच्च अदालत ने एक ऐसे मामले में कड़ा फैसला सुनाया है, जहां एक व्यक्ति को अपहरण और हत्या के झूठे मामले में बिना किसी पुख्ता सबूत के 6 साल तक विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में काटने पड़े, और बाद में अदालत से उसे बरी होना पड़ा।

​न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने अपने 11 पृष्ठों के फैसले में इस पूरी प्रक्रिया को "न्याय का गंभीर उपहास" और पुलिस जांच का "क्लासिक नेगेटिव उदाहरण" करार दिया है। अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को आदेश दिया है कि वह पीड़ित को 6 लाख रुपये का मुआवजा दे।

​मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी सफर

  • ​एफआईआर और गिरफ्तारी: यह मामला उत्तर प्रदेश के आगरा जिले के थाना अचनेरा में दर्ज एफआईआर संख्या 367/2019 से जुड़ा है, जो भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 364, 302 और 201 के तहत दर्ज की गई थी। याचिकाकर्ता (अरुण उर्फ दीपक) को इस मामले में 14 नवंबर 2019 को गिरफ्तार किया गया था।

  • ​सुप्रीम कोर्ट का पिछला आदेश: इससे पहले 23 मार्च 2026 को न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने मामले की लंबी अवधि (6 साल से जेल में बंद होने) और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित होने को देखते हुए निचली अदालत को 3 महीने के भीतर ट्रायल पूरा करने का निर्देश दिया था।

  • ​अदालत का बरी होना और फैसला: निर्देश के बाद ट्रायल पूरा हुआ और याचिकाकर्ता को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 100 से अधिक पृष्ठों के हिंदी में आए उस फैसले का अनुवाद करवाकर अध्ययन किया, जिसके बाद पुलिस की पोल खुली।

​पुलिस जांच की गंभीर खामियां और सुप्रीम कोर्ट के खुलासे

​सुप्रीम कोर्ट ने हिंदी से अनूदित फैसले की समीक्षा करते हुए बताया कि किस प्रकार पुलिस ने बिना किसी प्राथमिक या बुनियादी जांच के एक निर्दोष व्यक्ति के जीवन के 6 अनमोल वर्ष बर्बाद कर दिए। अदालत ने जांच में निम्नलिखित बड़ी कमियां पाईं:

  • ​प्राथमिक एफआईआर में नाम नहीं: याचिकाकर्ता का नाम न तो मूल एफआईआर में था और न ही सीआरपीसी की धारा 161 के तहत दिए गए बयान में [cite उसे फंसाया गया]। उसे केवल एक अस्पष्ट सीसीटीवी फुटेज और एक सह-आरोपी के इकबालिया बयान के आधार पर आरोपी बनाया गया।

  • ​शव और डीएनए की पुष्टि नहीं: पुलिस ने बरामद हड्डियों (खोपड़ी, आधी जली जांघ की हड्डी, पसलियां आदि) को मृतक का होने का दावा किया, लेकिन न तो पोस्टमार्टम में मौत का कारण स्पष्ट हुआ और न ही FSL डीएनए जांच के लिए मृतक के पिता (PW1) का डीएनए सैंपल लेकर मिलान कराया गया।

  • ​गवाहों और बयानों की पोल:
    • ​मुकदमे में अभियोजन पक्ष की ओर से कुल 6 गवाह (शिकायतकर्ता पिता, डॉक्टर, हेड कांस्टेबल, सब-इंस्पेक्टर, सर्कल ऑफिसर और एक स्वतंत्र गवाह) पेश किए गए।
    • ​शिकायतकर्ता (PW1) ने दावा किया कि आरोपियों ने उसके घर आकर 50 लाख रुपये की फिरौती मांगी और धमकी दी, साथ ही एक महिला ने उसके बेटे का आधार कार्ड और बैंक पासबुक दिखाई। हैरानी की बात यह थी कि इस फिरौती की कोई भी शिकायत पुलिस को कभी नहीं दी गई थी, और इसे सीधे अदालत में पहली बार कहा गया।

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  • ​इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों में कानूनी चूक: पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज और कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) का इस्तेमाल किया, लेकिन भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65B के तहत अनिवार्य प्रमाण पत्र (Certificate) रिकॉर्ड पर प्रस्तुत नहीं किया गया। साथ ही, सिम कार्ड किसके नाम पर थे, इसकी कोई जांच नहीं की गई।

  • ​पेट्रोल और हत्या की मनगढ़ंत कहानी: जांच अधिकारी (Circle Officer / PW5) ने दावा किया कि आरोपियों ने नींद की गोलियां दीं, मुंह पर टेप लगाया और दम घुटने से मौत के बाद 55 लीटर पेट्रोल खरीदकर शव जला दिया। लेकिन शव जलाने वाले स्थान की कोई फॉरेंसिक जांच नहीं हुई, न ही पेट्रोल पंप से कोई साक्ष्य जुटाया गया और न ही पेट्रोल की कैन का रासायनिक परीक्षण कराया गया।

  • ​बरामदगी के नियमों का उल्लंघन: साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत आरोपियों द्वारा चीजें छिपाने के संबंध में कोई विधिवत बयान दर्ज नहीं किया गया था।

​सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणियां

​फैसला लिखते हुए न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन ने तीखी टिप्पणियां करते हुए कहा:

​"यह इस बात का एक क्लासिक मामला है कि जांच किस तरह से नहीं की जानी चाहिए, जिसके परिणामस्वरूप अभियोजन पक्ष ने एक व्यक्ति के जीवन और स्वतंत्रता को खतरे में डाल दिया।"

 

​अदालत ने आगे कहा:

​"महज़ अनुमानों और अटकलों पर गढ़ी गई एक मनगढ़ंत कहानी के दम पर एक व्यक्ति के जीवन के 6 साल मिटा दिए गए। यहां तक कि प्राथमिक स्तर की शुरुआती जांच भी नहीं की गई।"

फैसला सुनाते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने तीखी और स्पष्ट टिप्पणियां कीं:

  • ​"छह साल बर्बाद कर दिए गए": अदालत ने कहा, "महज़ अनुमानों और अटकलों पर गढ़ी गई एक मनगढ़ंत कहानी के दम पर एक व्यक्ति के जीवन के 6 साल मिटा दिए गए। प्राथमिक स्तर की शुरुआती जांच तक नहीं की गई।"
  • ​एजेंसियों की जिम्मेदारी: अदालत ने रेखांकित किया कि जांच और अभियोजन एजेंसियों का काम केवल किसी भी तरह से सजा दिलाना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि न्याय पीड़ित के साथ-साथ उस आरोपी को भी मिले जो कानूनन निर्दोष माना जाता है

​न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि जांच और अभियोजन एजेंसियों का काम केवल और केवल किसी भी कीमत पर सजा दिलवाना नहीं है। उन्हें न्याय वितरण प्रणाली का मुख्य हिस्सा होना चाहिए जो पीड़ित के साथ-साथ उस आरोपी के अधिकारों की भी रक्षा करे जो कानूनन तब तक निर्दोष माना जाता है जब तक उसका अपराध साबित न हो जाए।

​अदालत के अंतिम निर्देश और मुआवजा

  • ​पुलिस अधिकारियों को ट्रेनिंग की सलाह: सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस आदेश की एक प्रति उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) और राज्य के गृह सचिव को भेजी जाए, ताकि पुलिस बल के अधिकारियों को उचित जांच प्रक्रिया (Proper Investigation Procedures) के तौर-तरीकों पर प्रशिक्षित किया जा सके।

  • ​6 लाख रुपये का मुआवजा: अदालत ने कहा कि जेल में काटे गए 6 वर्षों की तुलना में यह राशि बहुत कम है, फिर भी राज्य सरकार को आदेश दिया जाता है कि वह याचिकाकर्ता को 1 महीने के भीतर 6,00,000 रुपये (6 लाख रुपये) का मुआवजा दे।

  • ​ब्याज का प्रावधान: यदि तय एक महीने की समय-सीमा के भीतर यह भुगतान नहीं किया जाता है, तो इस राशि पर 18% प्रति वर्ष की दर से ब्याज वसूला जाएगा।

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